हिंदी संस्करण।
ह्रदय सूत्र
ऐसा मैंने सुना एक समय भगवान बुद्ध राजगृह में गृद्धकूट पर्वत पर भिक्षुओं की महती संघ और बोधिसत्वों के महासंघ के साथ ठहरे हुए थे, उस समय भगवान बुद्ध गा, गंभीर- अवभास नामक धर्मपर्याय समाधी मे समाहित रहे। तब उसी समय बोधिसत्व - महासत्व आर्य अवलोकितेश्वर ने भी प्रज्ञा पारमिता के गंभीर चर्या पर द्रष्टी डाली और उन पंच स्कन्धों के स्वभाव शून्यता को देखा। तत्पश्चात बुद्ध के प्रभाव से आयुष्मान शारिपुत्र ने बोधिसत्व - महासत्व आर्य अवलोकितेश्वर से ऐसा कहा जो कोई कुलपुत्र अथवा कुलपुत्री प्रज्ञापारमिता के गंभीर चर्या के चरण के इच्छा वाले हों, उन्हें कैसी शिक्षा लेनी चाहिए ?
ऐसा कहते ही बोधिसत्व महासत्व आर्य अवलोकितेश्वर ने आयुष्मान शारिपुत्र को ऐसा कहा - शारिपुत्र ! जो कोई कुलपुत्र अथवा कुलपुत्री प्रज्ञापारमिता की गंभीर चर्या के आचरण की इच्छा वाले हों उन्हें इस प्रकार देखना चाहिए कि वे पंच स्कंध भी स्वभाव से शुन्य हैं, ऐसी सम्यक द्रष्टी डालें। रूप शुन्य है। शून्यता ही रूप है। रूप से शून्यता पृथक नहीं है, शून्यता से रूप पृथक नहीं है। उसी तरह वेदना, संज्ञा , संस्कार , और विज्ञान भी शुन्य है।शारिपुत्र इसीलिए सभी धर्म शून्य हैं, अलक्षण हैं, अनुत्पन्न हैं, अनिरुद्ध हैं, अमल ,विमल, अनून और असम्पूर्ण हैं। शारिपुत्र इसीलिए शून्यता का न रूप हैं , न वेदना है, न संज्ञा है, न संस्कार है, न विज्ञान है।
न चक्षु है, न श्रोत्र है, न घ्राण है, न जिव्हा है, न काय है, न मन है, न रूप है, न शब्द है, न गंध है, न रस है, न स्पर्श है, न धर्म है। चक्षु धातु से लेकर मनोधातु तथा मनोविज्ञान धातु तक भी नहीं है। न विधा है और अविधा छय न होने से लेकर न जन्ममरण है तथा जरामरण छय तक भी नहीं है। उसी तरह दुःख, समुदय, निरोध तथा मार्ग नहीं है। न ज्ञान है, न प्राप्ति है और न ही अप्राप्ति है। शारिपुत्र ! इसलिए बोधिसत्व लोग अप्राप्ति के कारण इस गंभीर प्रज्ञापारमिता पर आश्रित रहते हैं। अतः चित आवरण रहित होकर त्रस्त नहीं होते हैं और विपर्यास से अतीत होकर निर्वाण प्राप्त करते हैं।
तीनों कालों में अवस्थित सभी बुद्ध भी इस गंभीर प्रज्ञापारमिता पारमिता के आश्रय से अनुत्तर सम्यक सम्बोधि के अभिसंबुद्धत्व को प्राप्त करते हैं। अतः पज्ञापारमिता मंत्र हैं, महाविधा मंत्र है, सर्व दुःख प्रशमनमंत्र है, अमिथ्यातत्व के कारण इसे सत्य जान लें। अतः प्रज्ञापारमिता का मंत्र कहा जाता है - तद्यथा ॐ गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा। शारिपुत्र! बोधिसत्व महासत्त्वों द्वारा इस प्रकार गंभीर प्रज्ञापारमिता का शिक्षण करें।
उसके पश्चात भगवान बुद्ध उस समाधी से उठकर बोधिसत्व महासत्व आर्य अवलोकितेश्वर को साधुवाद दिया - साधु, साधु, कुलपुत्र ! ऐसा ही है, ऐसा ही है जैसे तुमने निर्दिष्ट किया है उसी तरह गंभीर प्रज्ञापारमिता की चर्या का आचरण करें। (इस प्रकार सभी तीनों कालों के ) तथगतों ने भी इसका अनुमोदन किया। भगवन बुद्ध ने इस प्रकार उपदेश दिया तो आयुष्मान शारिपुत्र, बोधिसत्व महासत्व आर्य अवलोकितेश्वर सहित सभी परिषद तथा देवता, मनुष्य, असुर, एवं गन्धर्व सहित सम्पूर्ण लोक ने अनुमोदन किया और भगवान बुद्ध के उपदेश का अभिनन्दन किया।
संस्कृत संस्करण।
प्रज्ञापारमिताहॄदय सूत्रं
नमः सर्वज्ञाय ॥
आर्यावलोकितेश्वरो बोधिसत्त्वो गंभीरायां प्रज्ञापारमितायां चर्यां चरमाणो व्यवलोकयति स्म।
पञ्च स्कन्धास्तांश्च स्वभावशून्यान्पश्यति स्म ।
इह शारिपुत्र रूपं शून्यता शून्यतैव रूपम् ।
रूपान्न पृथक्शून्यता शून्याताया न पृथग्रूपम् ।
यद्रूपं सा शून्यता या शून्यता तद्रूपम् ।
एवमेव वेदानासंज्ञासंस्कारविज्ञानानि ।
इह शारिपुत्र सर्वधर्माःशून्यतालक्षणा
अनुत्पन्ना अनिरुद्धा अमलाविमला नोना न परिपूर्णाः ।
तस्माच्चारिपुत्र शून्यतायां न रूपं
न वेदना न संज्ञा न संस्कारा न विज्ञानं ।
न चक्षुः श्रोत्र घ्राण जिह्वा काय मनांसि
न रूपशब्दगन्धरसस्प्रष्टव्यधर्माः
न चक्षुर्धातुर्यावन्न मनोविज्ञानधातुः ।
न विद्या नाविद्या न विद्याक्षयो नाविद्याक्षयो
यावन्न जरामरणं न जरामरणक्षयो
न दुःखसमुदयनिरोधमार्गा न ज्ञानं न प्राप्तिः ।
तस्मादप्राप्तित्वाद्बोधिसत्त्वानां प्रज्ञापारमितामाश्रित्य
विहरत्यचित्तावरणः ।
चित्तावरणनास्तित्वादत्रस्तो विपर्यासातिक्रान्तो निष्ठनिर्वाणः ।
त्र्यधवव्यवस्थिताः सर्व बुद्धाः प्रज्ञापारमिताम्
आश्रित्यानुत्तरां सम्यक्सम्बोधिं अभिसम्बुद्धाः ।
तसाज्ज्ञातव्यं प्रज्ञापारमितामहामन्त्रो
महाविद्यामन्त्रो ऽ नुत्तरमन्त्रो ऽ समसममन्त्रः सर्वदुःखप्रशमनः ।
सत्यममिथ्यत्वात्प्रज्नापारमितायामुक्तो मन्त्रः
तद्यथा ।
गते गते पारगते परसंगते बोधि सवाहा ॥
इति प्रञापारमिताहृदयं समाप्तम्




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