मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग २' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग तीन पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)
६. मैं कहता हूँ कि हर आदमी के लिये यह परमावश्यक है कि वह इन पांच शीलों को स्वीकार करे | क्योंकि हर आदमी के लिये जीवन का कोई मापदण्ड होना चाहिये, जिससे वह अपनी अच्छाई-बुराई को माप सके; मेरे धम्म के अनुसार ये पांच शील जीवन की अच्छाई-बुराई मापने के माप-दण्ड ही हैं |
७. दुनिया में हर जगह पतित (गिरे हुए) लोग होते ही हैं | लेकिन पतित दो तरह के होते है; एक तो पतित वे होते हैं जिनके जीवन का कोई माप-दण्ड होता है, दूसरे पतित वे होते हैं जिनके जीवन का कोई माप-दण्ड नहीं होता |
८. जिसके जीवन का कोई माप-दण्ड नहीं होता वह 'पतित' होने पर भी यह नहीं जानता कि वह 'पतित' है | इसलिये वह हमेशा 'पतित' ही रहता है, दूसरी ओर जिसके जीवन का कोई माप-दण्ड होता है वह हमेशा इस बात की कोशिश करता रहता है कि पतितावस्था से ऊपर उठे । क्यों? इसका उत्तर यही है कि वह जानता है कि वह पतित है, गिर गया है |
९. आदमी के लिये जीवन-सुधार का कोई माप-दण्ड होने और न होने का यही बड़ा अन्तर है | आदमी अपने स्तर से नीचे गिर पड़े यह इतनी बडी बात नहीं है जितनी यह कि, आदमी के जीवन का कोई स्तर ही न हो |
१०. हे परिव्राजकों, तुम पूछ सकते हो कि इन पाँच शीलों को जीवन का माप-दण्ड ही क्यों स्वीकार किया जाय?
११. इस प्रश्न को उत्तर तुम्हे स्वयं ही मिल जायेगा यद्वि तुम अपने से ही यह प्रश्न पूछो -क्या यह शील व्यक्ति के लिये कल्याणकारी है? और साथ ही यह भी पूछो, क्या इन शीलों का पालन करना समाज के लिए कल्याणकारी है?
१२. यदि इन दोनों प्रश्नों का तुम्हारा उत्तर स्वीकारात्मक है तो इस से यह सीधा परिणाम निकलता है कि मेरे पवित्रता के पथ के ये पांच शील इस योग्य है कि उन्हें जीवन का सच्चा माप-दण्ड मान लिया जाय |
अष्टांगिक-मार्ग या सम्यकमार्ग
१. इसके आगे बुद्ध ने उन परिव्राजकों को अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया | बुद्ध ने कहा -- इस मार्ग के आठ अंग हैं |
सम्यक दृष्टि




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