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धम्मचक्र प्रवर्तन - ३

मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग २' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग तीन पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)

                                                                                                                                                       












६. मैं कहता हूँ कि हर आदमी के लिये यह परमावश्यक है कि वह इन पांच शीलों को स्वीकार करे | क्योंकि हर आदमी के लिये जीवन का कोई मापदण्ड होना चाहिये, जिससे वह अपनी अच्छाई-बुराई को माप सके; मेरे धम्म के अनुसार ये पांच शील जीवन की अच्छाई-बुराई मापने के माप-दण्ड ही हैं |

७. दुनिया में हर जगह पतित (गिरे हुए) लोग होते ही हैं | लेकिन पतित दो  तरह के होते है; एक तो पतित वे होते हैं जिनके जीवन का कोई माप-दण्ड होता है, दूसरे पतित वे होते हैं जिनके जीवन का कोई माप-दण्ड नहीं होता |

८. जिसके जीवन का कोई माप-दण्ड नहीं होता वह 'पतित' होने पर भी यह नहीं जानता कि वह 'पतित' है | इसलिये वह हमेशा 'पतित' ही रहता है, दूसरी ओर जिसके जीवन का कोई माप-दण्ड होता है वह हमेशा इस बात की कोशिश करता रहता है कि पतितावस्था से ऊपर उठे । क्यों? इसका उत्तर यही है कि वह जानता है कि वह पतित है, गिर गया है |

९. आदमी के लिये जीवन-सुधार का कोई माप-दण्ड होने और न होने का यही बड़ा अन्तर है | आदमी अपने स्तर से नीचे गिर पड़े यह इतनी बडी बात नहीं है जितनी यह कि, आदमी के जीवन का कोई स्तर ही न हो |

१०. हे परिव्राजकों, तुम पूछ सकते हो कि इन पाँच शीलों को जीवन का माप-दण्ड ही क्यों स्वीकार किया जाय?

११. इस प्रश्न को उत्तर तुम्हे स्वयं ही मिल जायेगा यद्वि तुम अपने से ही यह प्रश्न पूछो -क्या यह शील व्यक्ति के लिये कल्याणकारी है? और साथ ही यह भी पूछो, क्या इन शीलों का पालन करना समाज के लिए कल्याणकारी है?

१२. यदि इन दोनों प्रश्नों का तुम्हारा उत्तर स्वीकारात्मक है तो इस से यह सीधा परिणाम निकलता है कि मेरे पवित्रता के पथ के ये पांच शील इस योग्य है कि उन्हें जीवन का सच्चा माप-दण्ड मान लिया जाय |


अष्टांगिक-मार्ग या सम्यकमार्ग

१. इसके आगे बुद्ध ने उन परिव्राजकों को अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया | बुद्ध ने कहा -- इस मार्ग के आठ अंग हैं |

सम्यक दृष्टि

२. बुद्ध ने सर्वप्रथम सम्मा ढिट्टी ( सम्यक दृष्टि) की व्याख्या की जो अष्टांगिक मार्ग में प्रथम है और प्रधान है |

३. सम्यक्‌ बुद्ध ने परिव्राजकों से दृष्टि का महत्व समझाने के लिये कहा -

४. "हे परिव्राजकों! तुम्हें इस का बोध होना चाहिये कि यह संसार एक कारागार है और आदमी इस कारागार में एक कैदी है |”

५. इस कारागार में इतना अधिक अन्धकार है कि यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता | कैदी को यहाँ तक दिखाई नहीं देता कि वह कैदी है |

६ . इतना ही नहीं कि बहुत अधिक समय तक इस अन्धेरी कोठरी में ही पड़े रहने के कारण आदमी एकदम अन्धा हो गया हो, बल्कि उसे इस बात मे भी बड़ा सन्देह हो गया है कि प्रकाश नाम की कोई चीज भी कभी कहीं हो सकती है?

७. मन ही एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से आदमी को प्रकाश की प्राप्ति हो सकती है |

८. लेकिन इन कारागार-वासियों के दिमाग की भी अवस्था ऐसी नही है कि यह उद्देश्य पूरा हो सके |

९. इनका दिमाग जरासा प्रकाश मात्र आने देता है, इतना ही जिससे कि जिनके पास आँख है वह यह देख सकें कि अन्धकार नाम की भी कोई वस्तु है |

१०. इसलिये ऐसी समझ बड़ी सदोष है |

१९. लेकिन हे परिव्राजकों ! कैदी की स्थिति ऐसी निराशजनक नहीं है जैसी यह प्रतीत होती है |

१२. क्‍योंकि आदमी में एक बल है, एक शक्ति है जिसे संकल्प-बल व इच्छा-शक्ति कहा जाता है | जब आदमी के सम्मुख कोई उपयुक्त आदर्श उपस्थित होता है तो इस इच्छा-शक्ति को जागृत और क्रिया-शील बनाया जा सकता है|

१३. आदमी को यदि कहीं से इतना भी प्रकाश मिल जाये कि वह यह देख सके कि वह अपनी इच्छा-शक्ति का ऐसा संचालन कर सकता है कि वह अन्त में उसे बन्धन-मुक्त कर दे |

१४. इसलिये यद्यपि आदमी बन्धन में है तो भी वह स्वतन्त्र हो सकता है; वह किसी भी समय ऐसा पहला कदम उठा सकता है कि एक न एक दिन वह स्वतन्त्र होकर रहे |

१५. यह इसलिये कि हम जिस किसी दिशा में भी अपने मन को ले जाना चाहे, हम उसे उस दिशा में ले जा सकते हैं | मन ही है जो हमें जीवन-रूपी कारागार का कैदी बनाता है और यह मन ही है जो हमें कैदी बनाये रखता है |

 (शेष अगले भाग में...............) 


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