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धम्मचक्र प्रवर्तन - ४

मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग ३' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग चार पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)

                                                                                                                            



१६. लेकिन मन ने ही जिसे बनाया है मन ही उसे नष्ठ भी कर सकता है, मन अपनी कृति को मटियामेट भी कर सकता है | यदि इसने आदमी को बंधन में बांधा है तो ठीक दिशा में अग्रसर होने पर यही आदमी को बंधन-मुक्त कर सकता है |

१७. यह है जो सम्यक दृष्टि कर सकती है |

१८. तब परिव्राजकों  ने प्रश्न किया “सम्यक-दृष्टि का अन्तिम उद्देश्य क्या है?” बुद्ध ने उत्तर दिया -“अविद्या का विनाश ही सम्यक- दृष्टि का उद्देश्य है | यह मिथ्या-दृष्टि की विरोधिनी है ।”

१९. “और अविद्या का अर्थ है कि आदमी दुःख को न जान सके, आदमी दु:ख के निरोध के उपाय को न जान सके -- आदमी इन आर्य-सत्यों को न जान सके |”

२०. सम्यक दृष्टि का मतलब है कि आदमी कर्म-काण्ड के क्रिया-कलाप को व्यर्थ समझे, आदमी शास्त्रों की पवित्रता की मिथ्या-धारणा से मुक्त हो ।

२१. सम्यक दृष्टि का मतलब है कि आदमी ऐसी सब मिथ्या-विश्वास से मुक्त हो, आदमी यह न समझता रहे कि कोई भी बात प्रकृति के नियमों के विरुद्ध घट सकती है |

२२. सम्यक दृष्टि का मतलब है कि आदमी ऐसी सब मिथ्या-धारणाओं से मुक्त हो जो आदमी के मन की कल्पना-मात्र है और जिनका आदमी के अनुभव या यथार्थता से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं |

२३. सम्यक-दृष्टि का मतलब है कि आदमी का मन स्वतन्त्र हो, आदमी के विचार स्वतन्त्र हों |

सम्यक संकल्प

२४. हर आदमी की कुछ आशायें होती हैं, आकांक्षायें होती हैं; महत्वाकांक्षायें होती हैं | सम्यक संकल्प का मतलब है कि हमारी आशायें, हमारी आकांक्षायें ऊंचे स्तर की हों, निम्नस्तर की न हों, हमारे योग्य हों, अयोग्य न हों |

सम्यक वाणी

२५. सम्यकवाणी का मतलब है कि,

(१) आदमी सत्य ही बोले, 

(२) आदमी असत्य न बोले, 

(३) आदमी दूसरों की बुराई न करता फिरे, 

(४) आदमी दूसरों के बारे में झूठी बातें  न फैलाता फिरे, 

(५) आदमी किसी के प्रति गाली-गलौज का व कठोर वचनों का व्यवहार न करे, 

(६) आदमी सभी के साथ विनम्र वाणी का व्यवहार करे, 

(७) आदमी व्यर्थ की, बेमतलब बातें न करता रहे, बल्कि उसकी वाणी बुद्धिसंगत हो, सार्थक हो और सोद्देश्य हो |

२६. जैसा मैने समझाया सम्यक-वाणी का व्यवहार न किसी के भय की अपेक्षा रखता है, और न किसी के पक्षपात की | इसका इससे कुछ भी सम्बन्ध नहीं होना चाहिये कि कोई “बड़ा आदमी” उसके बारे में क्या सोचने लगेगा अथवा सम्यक-वाणी के व्यवहार से उसकी क्या हानि हो सकती है |

२७. सम्यक-वाणी का माप-दण्ड न किसी “ऊपर के आदमी” की आज्ञा है, और न किसी व्यक्ति को हो सकनेवाला व्यक्तिगत लाभ |

सम्यक कर्मान्त

२८. सम्यक कर्मान्त योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है | हमारा हर कार्य ऐसा हो जिसके करते समय हम दूसरों की भावनाओं और अधिकारों का ख्याल रखें |

२९. सम्यक-कर्मान्त का माप-दण्ड क्या है? सम्यक कर्मान्त का माप-दण्ड यही है कि हमारा कार्य जीवन के जो मुख्य नियम हैं उनसे अधिक से अधिक समन्वय रखता हो |

३०. जब किसी आदमी के कार्य इन नियमों से समन्वय रखते हों, तो उन्हें हम सम्यक-कर्म कह सकते हैं |

३१. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका कमानी ही होती है | लेकिन जीविका कमाने के ढंगों और ढंगों में अन्तर हैं | कुछ बुरे हैं, कुछ भले हैं | बुरे ढंग वे हैं जिनसे किसी की हानि होती है अथवा किसी के प्रति अन्याय होता है | अच्छे ढंग वे हैं जिनसे आदमी बिना किसी को हानि पहुंचाये अथवा बिना किसी के साथ अन्याय किये अपनी जीविका कमा सकता है | यही सम्यक-आजीविका है।

सम्यक व्यायाम

३२. सम्यक्‌ व्यायाम; अविद्या को नष्ट करने के प्रयास की प्रथम सीढी है, इस दु:ख कारागार के द्वार तक पहुंचने का रास्ता ताकि उसे खोला जा सके |

३३. सम्यक-व्यायाम के चार उद्देश्य हैं |

१ . एक है अष्टांगिक-मार्ग विरोधी चित्त-प्रवृत्तियों की उत्पत्ति को रोकना |

२. दूसरा है ऐसी चित्त-प्रवृत्तियों को दबाना जो उत्पन्न हो गई हों |

३. तीसरा है चित्त-प्रवृत्तियों को उत्पन्न करना जो अष्टांगिक मार्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हों ।

४. चौथा है ऐसी उत्पन्न चित्त-प्रवृत्तियों में और भी अधिक वृद्धि करना तथा उनका विकास करना |


(शेष अगले भाग में...............)



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