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धम्मचक्र प्रवर्तन - २

मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग १' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग दो पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)

                                                                                                                                                       








९. हे परिव्राजकों  इस बात को समझ लो कि आदमी को इन दोनों अन्त की बातों से सदा बचना चाहिये -- एक तो उन चीजों के चक्कर में पडे रहने से जिनका आकर्षण काम-भोग सम्बन्धी तृष्णा पर निर्भर करता है -- यह एक बहुत निम्न कोटि की बात है; अयोग्य है, हानिकर है तथा दूसरी और तपश्चर्या अथवा काय-क्लेश से, क्योंकि वह भी कष्ट-प्रद है, अयोग्य है तथा हानिकार है |

१०. इन दोनों अंतों से, इन दोनों सिरे की बातों के बीच में एक मध्यम मार्ग है -- बीच का रास्ता | यह समझ लो कि मैं उसी मध्यम मार्ग का उपदेष्टा हूँ।

११. पांचों परिव्राजकों ने उनकी बात ध्यान से सुनी | वे यह नहीं जानते थे कि बुद्ध के मध्यम मार्ग के बारे में क्या कहें  | इसलिये उन्होंने प्रश्न किया -- जब हम आपका साथ छोड़कर चले आये, उस के बाद से आप कहाँ कहाँ रहे, क्या क्या किया? तब बुद्ध ने उन्हे बताया कि किस प्रकार गया पहुँचे, कैसे उस पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठे और कैसे चार सप्ताह की निरन्तर समाधि के बाद उन्हें वह नया बोध प्राप्त हुआ जिससे वह नये मार्ग का आविष्कार कर सके|

१२. यह सुना तो परिव्राजक उस नये-मार्ग को विस्तारपूर्वक जानने के लिये अत्यन्त उत्सुक हो उठे । उन्होंने बुद्ध से प्रार्थना की कि वे उन्हें बतायें |

१३. बुद्ध ने स्वीकार किया |

१४. बुद्ध ने पहली बात यह बताई कि उनके सद्धर्म को आत्मा,परमात्मा से कुछ लेना देना नहीं है | उनके सद्धर्म को मरने के बाद (आत्मा का) क्या होता है इससे कुछ सरोकार नहीं है | उनके सद्धर्म को कर्म-काण्ड के क्रिया-कलापों से भी कुछ लेना-देना नहीं |

१५. बुद्ध के धम्म का केन्द्र-बिन्दु है आदमी और इस पृथ्वी पर रहते समय आदमी का आदमी के प्रति क्‍या कर्तव्य होना चाहिये?

१६. बुद्ध ने कहा, यह उनकी पहली स्थापना है |

१७. उनकी दूसरी स्थापना है कि आदमी दु:खी है, कष्ट में है और दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहा है | संसार दुःख से भरा पड़ा है और धम्म का उद्देश इस दुःख का नाश करना ही है | इसके अतिरिक्त सद्धर्म और कुछ नही है |

१८. दुःख के अस्तित्व की स्वीकृति और दुःख के नाश करने का उपाय -- यही धम्म की आधार शिला है |

१९. धम्म के लिये एकमात्र यही सही आधार हो सकता है | जो धर्म इस प्राथमिक बात को भी अंगीकारी नहीं कर सकता, धम्म ही नही है ।

२०. हे परिव्राजकों ! जो भी श्रमण या ब्राह्मण (धर्मोपदेष्ठा) यह भी नहीं समझ पाते कि संसार मे दुःख है और उस दुःख के नाश का उपाय है । ऐसे श्रमण ब्राह्मण मेरी सम्मति में श्रमण-ब्राह्मण ही नहीं हैं, न वे अपने को ज्येष्ठ-श्रेष्ठ समझने वाले इतना भी समझ पाये हैं कि धम्म का सही अर्थ क्या है?

२१. तब परिव्राजकों ने पूछा दु:ख और दुःख का विनाश ही यदि आप के धम्म की आधार-शिला है तो हमें बताइये कि आप का धम्म कैसे दु:ख का नाश कर सकता है?

२२. तब बुद्ध ने उन्हें समझाया कि उनके धम्म के अनुसार यदि हर आदमी (१) पवित्रता के पथ पर चले, (२) धम्म के पथ पर चले, (३) शील- मार्ग पर चले तो इस दुःख का एकान्तिक निरोध हो सकता है |

२३. और उन्होने कहा कि उन्होंने ऐसे धम्म का आविष्कार कर लिया है |


धम्म की व्याख्या

१. परिव्राजकों ने तब बुद्ध से अपने धम्म की व्याख्या करने की प्रार्थना की |

२. बुद्ध ने कृपया इसे स्वीकार किया|

३. उन्होंने सब से पहले उन्हें पवित्रता का पथ ही समझाया |

४. उन्होंने परिव्राजकों से कहा 'कोई भी आदमी जो अच्छा बनना चाहता है उसके लिये यह आवश्यक है कि वह कोई अच्छाई का माप-दण्ड स्वीकार करे।'

५. “मेरे पवित्रता के पथ के अनुसार अच्छे जीवन के पांच माप दण्ड हैं -

(१) किसी प्राणी की हिंसा न करना 

(२) चोरी न करना अर्थात्‌ दूसरे की चीज को अपनी न बना लेना, 

(३) व्यभिचार न करना, 

(४) असत्य न बोलना, 

(५) नशीली चीजों का ग्रहण न करना|

              
   (शेष अगले भाग में...............) 



 

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