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धम्मचक्र प्रवर्तन - ५

मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग ४ ' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग पांच पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)

                                                                                                   









सम्यक स्मृति

३४. सम्यक स्मृति का मतलब है हर बात पर ध्यान दे सकना | यह मन की सतत जागरूकता है | मन में जो अकुशल विचार उठते  हैं, उन की चौकीदारी करना सम्यक-समृति का ही एक दूसरा नाम है |

सम्यक समाधि

३५. 'हे परिव्राजकों ! जो आदमी सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम और सम्यक स्मृति को प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में पांच बाधाएँ या बन्धन आते हैं | 

३६. ये हैं लोभ, द्वेष, आलस्य, विचिकित्सा तथा अनिश्चय | इन बाधाओं को जो वास्तव में कडे बंधन ही हैं जीत लेना या तोड़ना आवश्यक है | इन बंधनों से मुक्त होने का उपाय समाधि है | लेकिन परिव्राजकों ! यह समझ लेना चाहिये कि समाधि और 'सम्यक समाधि' एक ही बात नहीं । दोनों में बड़ा अन्तर हैं |

३७. समाधि का मतलब है केवल चित्त की एकाग्रता | इसमें सन्देह नहीं कि इससे वैसे ध्यानों को प्राप्त किया जा सकता है कि जिनके रहते ये पांचों संयोजन या बन्धन स्थगित रहते हैं |

३८. लेकिन ध्यान की ये अवस्थायें अस्थायी हैं | इसलिये संयोजन या बंधन भी अस्थायी तौर पर ही स्थगित रहते हें |आवश्यकता है चित्त में स्थायी परिवर्तन लाने की | इस प्रकार का स्थायी-परिवर्तन सम्यक समाधि के द्वारा ही लाया जा सकता है।

३९. खाली समाधि एक नकारात्मक स्थिति है, क्योंकि यह इतना ही तो करती है कि संयोजनों को अस्थायी तौर पर स्थगित रखे | इसमें मन का स्थायी परिवर्तन निहित नहीं है | सम्यक समाधि एक भावात्मक वस्तु है | यह मन को कुशल-कर्मो का एकाग्रता के साथ चिन्तन करने का अभ्यास डालती है और इस प्रकार मन की संयोजनोत्पन्न अकुशल-कर्मों की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति को ही समाप्त कर देती है |

४०. सम्यक समाधि मन को कुशल और हमेशा कुशल ही कुशल (भलाई ही भलाई) सोचने की आदत डाल देती है | सम्यक समाधि मन को वह अपेक्षित शक्ति देती है, जिससे आदमी कल्याणरत रह सके |


शील का मार्ग

१. तदनन्तर बुद्ध ने उन परिव्राजकों को शील का पथ व सदगुणों का मार्ग समझाया |

२. उन्होंने उन्हें बताया कि शील के पथ का पथिक होने का मतलब है इन सदगुणों का अभ्यास करना; 

(१) शील, 

(२) दान, 

(३) उपेक्षा, 

(४) नैष्क्रम्य, 

(५) वीर्य, 

(६) शान्ति, 

(७) सत्य, 

(८) अधिष्ठान, 

(९) करूणा, और 

(१०) मैत्री ।

३. उन परिव्राजकों ने बुद्ध से इन सदगुणों का यथार्थ अर्थ समझना चाहा |

४. तब बुद्ध ने उनकी शंका मिटा कर उन्हे सन्तुष्ट करने के लिये कहा-

शील

५. “शील का मतलब है नैतिकता, अकुशल न करने की प्रवृत्ति और कुशल करने की प्रवृत्ति; बुराई करने में लज्जा-भय मानना | लज्जा-भय के कारण पाप से बचे रहने का प्रयास करना शील है | शील का मतलब है पापभीरूता |

नैष्क्रम्य

६. नैष्क्रम्य का मतलब है सांसारिक काम-भोगों का त्याग ।

दान

७. दान का मतलब है बदले में किसी भी प्रकार की स्वार्थ-पूर्ति की आशा के बिना दूसरों की भलाई के निमित्त अपनी सम्पत्ति का ही नहीं, अपने रक्त, अपने शरीर के अंगों और यहाँ तक कि अपने प्राणों तक का बलिदान कर देना |

वीर्य

८. वीर्य का मतलब है सम्यक प्रयत्न | जो कुछ एक बार करने का निश्चय कर लिया अथवा जो कुछ करने का संकल्प कर लिया उसे अपनी पूरी सामर्थ्य से करने का प्रयास करना और बिना उसे पूरा किये पीछे मुडकर नहीं देखना |

शान्ति

९. शान्ति का मतलब है क्षमा-शीलता । घृणा के उत्तर में घृणा नहीं करना यही इसका सार है | क्योंकि घृणा से तो घृणा कभी मिटती ही नहीं | क्षमा शीलता से ही घृणा का मर्दन होता है|

सत्य

१०. सत्य का मतलब है मृषावादी न होना | आदमी को कभी झूठ नहीं बोलना चाहिये | उसे सत्य और केवल सत्य ही बोलना चाहिये |

अधिष्ठान

११. अधिष्ठान का मतलब है अपने उद्देश्य तक पहुंचने का दृढ़ निश्चय |

करूणा

१२. करूणा का मतलब है सभी मानवों और प्राणियों के प्रति प्रेमभरी दया।

मैत्री

१३. मैत्री का मतलब है कि सभी प्राणियों के प्रति भ्रात्र-भावना हो, मित्रों के प्रति ही नहीं, शत्रुओं तक के प्रति; आदमियों के प्रति ही नहीं, सभी विश्व शेष प्राणियों के प्रति ।

उपेक्षा

१४. उपेक्षा का मतलब है अनासक्ति, यह दूसरों के सुख-दुःख के प्रति निरपेक्ष भाव रखने से सर्वथा भिन्‍न वस्तु है | यह चित्त की वह अवस्था है जिसमें प्रिय-अप्रिय कुछ नहीं है | फल कुछ भी हो उसकी ओर से निरपेक्ष रहकर साधना में रत रहना |

१५. इन सदगुणों का आदमी को अपनी पूरी सामर्थ्य से अभ्यास करना होता है | इसीलिये उन्हे 'पारमिता' कहा गया है |


(शेष अगले भाग में...............) 




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