मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग ५ ' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग छे पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)
सम्यक व्याख्या
१. अपने धम्म का उपदेश देकर और उसकी सम्यक व्याख्या करते हुए बुद्ध ने परिव्राजकों से प्रश्न किया-
२. “क्या आदमी के चरित्र की पवित्रता ही संसार की भलाई की आधारशिला नहीं है?” उनका उत्तर था -- “हाँ, यह ऐसा ही है |”
३. और फिर बुद्ध ने पूछा “क्या ईर्षा, राग, अज्ञान, हिंसा, चोरी, व्यभिचार और असत्य चरित्र की पवित्रता की जड नहीं खोद देते? क्या व्यक्तिगत पवित्रता के लिये यह आवश्यक नहीं है कि आदमी में इतना चारित्रिक बल हो कि वह इस प्रकार की बुराइयों के वश में न आ सके? यदि किसी आदमी में व्यक्तिगत पवित्रता ही नहीं है तो वह जन-कल्याण कैसे कर सकता है?” उनका उत्तर था- 'हां, यह ऐसा ही है ।”
४. “और आदमी दूसरों को अपना गुलाम बनाना, दूसरों को अपने वश मे रखना क्यों चाहते है ? आदमी दूसरों के सुख-दुःख की ओर से उदासीन क्यों है? क्या यह इसलिये नही है कि एक आदमी दूसरे के प्रति योग्य व्यवहार नहीं करता?” उनका उत्तर था, “हाँ, यह ऐसा ही है ।”
५. “तो क्या अष्टांग मार्ग का अनुसरण सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक आजीविका, सम्यक कर्मान्त, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि -- संक्षेप में सद्धम्म के अनुसार जीवन यापन -- यदि प्रत्येक उस पथ पर चले, तो उस सारी अमानवता का, उस सारे अन्याय का, जो एक आदमी दूसरे के प्रति करता है, अन्त नहीं कर देगा? उनका उत्तर था “हाँ, यह ऐसा ही है ।”
६ . अब बुद्ध ने शील या सदगुणों का उल्लेख करते हुए कहा -- “क्या अभावग्रस्तों का अभाव दूर करने के लिये, क्या दरिद्रों की दरिद्रता दूर करने के लिये और सामान्य जन-कल्याण करने के लिये दान आवश्यक नहीं है? क्या जहां कष्ठ है, जहां दरिद्रता है, उधर ध्यान देकर उसे दूर करने के लिये करूणा की आवश्यकता नहीं है? क्या निस्वार्थ भाव से काम करने के लिये निष्काम भाव की आवश्यकता नहीं है ? क्या व्यक्तिगत लाभ न होने पर भी सतत प्रयत्न में लगे रहने के लिये उपेक्षा की आवश्यकता नहीं है ?”
७. “क्या आदमी से प्रेम करना आवश्यक नहीं है?” उनका उत्तर था, हाँ ।”
८. मैं एक कदम आगे बढ़कर कहता हूँ, प्रेम करना पर्याप्त नहीं है, जिस चीज की आवश्यकता है, वह मैत्री है | प्रेम की अपेक्षा इसका क्षेत्र व्यापक है | इस का मतलब है, न केवल आदमियों के प्रति मैत्री बल्कि प्राणी मात्र के प्रति मैत्री | यह आदमियों में ही सीमित नहीं है | क्या ऐसी मैत्री अपेक्षित नहीं है ? इसके अतिरिक्त दूसरी कौन सी चीज है जो सभी आदमियों को वह सुख प्रद्नान कर सके जो सुख आदमी अपने लिये चाहता है, आदमी का चित्त पक्षपातरहित रहे, सभी के लिये खुला, सभी के लिये प्रेम और घृणा किसी से भी नहीं?”
९. उन सब ने कहा, “हाँ ।”
प्रज्ञा अर्थात निर्मल बुद्धि अथवा प्रज्ञा पारमिता
१०. “लेकिन इन सदगुणों के आचरण के साथ प्रज्ञा जुड़ी रहनी चाहिये, निर्मल बुद्धि ।”
११. "क्या प्रज्ञा आवश्यक नहीं है?” परिव्राजक मौन रहे, उन्हे अपने प्रश्न का उत्तर देने के लिये मजबूर करने की दृष्टि से तथागत ने अपना कथन जारी रखा । उन्होंने कहा :-“भला आदमी हम उसीको कहेंगे जो कोई बुरा काम न करे, बुरी बात न सोचे, बुरे तरीके से अपनी जीविका न कमाये और मुंह से कोई ऐसी बात भी न निकाले जिससे किसी की हानि हो अथवा किसी को कष्ट पहुंचे|” परिव्राजक बोले, “हां, यह ऐसा ही है।”
१२. “लेकिन क्या सत्कर्म भी एक अन्धे की भांति किये जाने चाहिये? मैं कहता हूँ कि नहीं | यह पर्याप्त नहीं है | यदि यह पर्याप्त होता तो हम एक छोटे बच्चे के बारे में कह सकते कि वह हमेशा भला ही भला है | क्योंकि अभी एक छोटा बच्चा यह भी नहीं जानता कि शरीर क्या होता है, वह लात चलाते रहने के अतिरिक्त और शरीर से कर ही क्या सकता है?
वह यह भी नहीं जानता कि वाणी क्या है? वह चिल्लाने के अतिरिक्त और उससे कोई बुरी बात कर ही क्या सकता है? वह यह भी नहीं जानता कि विचार क्या होता है? वह ज्यादा से ज्यादा प्रसन्नता के मारे किलकारी भर मार सकता है | वह यह नहीं जानता कि जीविकार्जन क्या होता है? वह किसी बुरे तरीके से अपनी जीविका क्या कमा सकता है? वह अपनी मां की छाती से दूध पीने के अतिरिक्त और कुछ जानता ही नहीं |”
१३. “इसलिये सदगुणों का अनुसरण भी प्रज्ञा-पूर्वक होना चाहिए, अर्थात निर्मल बुद्धि के साथ |”
१४. “एक और कारण भी है जिसकी वजह से प्रज्ञा पारमिता इतनी अधिक महत्वपूर्ण और इतनी अधिक आवश्यक है | दान तो होना ही चाहिये । किन्तु बिना प्रज्ञा के दान का भी दुष्परिणाम हो सकता है | करूणा तो होनी ही चाहिये । किन्तु बिना प्रज्ञा के करूणा भी बुराई की समर्थक बन जाती है | सभी दूसरी पारमिताये प्रज्ञा-पारमिता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिये | निर्मल बुद्धि का ही दूसरा नाम प्रज्ञा पारमिता है |”
(शेष अगले भाग में...............)




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