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धम्मचक्र प्रवर्तन - ७

 मेरा विनम्र निवेदन है पाठकों से की वे इस पोस्ट को पढ़ने से पहले, इस पोस्ट से जुडी पिछली पोस्ट- 'धम्मचक्र प्रवर्तन - भाग ६ ' को पढ़ें ताकि इस उपदेश का प्रवाह आपके मस्तिष्क में सरलता से बना रहे और आपको इसे समझने में आसानी हो, बाकि आप स्वतंत्र हैं। पोस्ट लम्बी न हो जाये इसलिए मैंने इसे भागों में विभाजित किया है, तो आईये अब भाग सात पढ़ते हैं इसी पोस्ट का। (अब आगे..........)

                                                                                                                                                       









१५. “मेरी स्थापना है कि आदमी को अकुशल-कर्म का ज्ञान होना चाहिये, अकुशल-कर्म की उत्पत्ति किस प्रकार होती है; इसी तरह उसे कुशल-कर्म का भी ज्ञान होना चाहिये, कुशल-कर्म की उत्पत्ति कैसे होती है? इसी प्रकार आदमी को कुशल-कर्म और अकुशल-कर्म का भेद भी स्पष्ट ज्ञात होना चाहिये | इस प्रकार के ज्ञान के बिना चाहे कम-विशेष अपने में शुभ-कर्म ही कुशल कर्म ही क्यों न हो, चाहे शुभ- कर्म अपने में शुभ-कर्म ही क्‍यों न हो, तब भी यथार्थ कुशल-भाव या यथार्थ शुभ-भाव नहीं ही है | इसीलिये मैं कहता हूँ कि प्रज्ञा एक आवश्यक सदगुण है |

१६. तब बुद्ध ने परिव्राजकों को इस प्रकार की प्रेरणा देते हुए अपना प्रवचन समाप्त किया :-

१७. “हो सकता है कि तुम मेरे धम्म को निराशावादी धम्म समझ बैठो, क्‍योंकि मैं आदमियों का ध्यान मानव-जाति के दुःख की ओर आकर्षित करता हूँ | मेरे धम्म के बारे में ऐसी धारणा बनाना गलती होगी |”

१८. “निस्सन्देह मेरा धम्म दुःख के अस्तित्व को स्वीकार करता है, किन्तु यह उतना ही जोर उस दुःख के दूर करने पर भी देता है |”

१९. “मेरे धम्म में दोनों बातें है -- इस में मानव जीवन का उद्देश्य भी निहित है और यह अपने में आशा का संदेश भी है |”

२०. “इसका उद्देश्य है अविद्या का नाश, जिसका  मतलब है दुःख के अस्तित्व के सम्बन्ध में अज्ञान का नाश |”

२१. “यह आशा का संदेश भी है क्योंकि यह दुःख के नाश का मार्ग बताता है |”

२२. “क्या तुम इस सब से सहमत हो या नहीं?” परिव्राजकों का उत्तर था-”हाँ |”


परिव्राजकों की धम्म-दीक्षा

१. उन पांचों परिव्राजकों ने यह तुरन्त देख लिया कि यह वास्तव में एक नया धम्म है | जीवन की समस्या के प्रति इस नये दृष्टिकोण से वे इतने अधिक प्रभावित हुए कि सभी एक साथ कहने लगे “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी भी धर्म के संस्थापक ने कभी यह शिक्षा नहीं दी कि दुनिया के दुःख की स्वीकृति ही धम्म का वास्तविक आधार है |”

२. “संसार के इतिहास में इससे पहले कभी किसी भी धम्म के संस्थापक ने यह शिक्षा नहीं दी कि दुनिया के इस दुःख को दूर करना ही धम्म का वास्तविक उद्देश्य है ।”

३. “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी ने भी कभी मुक्ति का ऐसा मार्ग नहीं सुझाया था जो इतना सरल हो, जो मिथ्या विश्वास और 'अपौरूषेय' शक्तियों की मध्यस्थता से इतना मुक्त हो, जो इतना स्वतन्त्र ही नहीं बल्कि जो किसी 'आत्मा' या' परमात्मा' के विश्वास का इतना विरोधी हो और जो मोक्ष लाभ के लिये मरणान्तर किसी जीवन में विश्वास रखना या न रखना भी अनिवार्य न मानता हो ।”

४. “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी ने भी कभी ऐसे धम्म की स्थापना नहीं की, जिसका 'इलहाम' या 'ईश्वर वचन' से किसी भी तरह का कुछ भी सम्बन्ध न हो और जिसके 'अनुशासन' आदमी की सामाजिक आवश्यकताओं के अध्ययन के परिणाम हों और जो किसी 'ईश्वर' की आज्ञायें न हों |”

५. “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी ने भी कभी 'मोक्ष' का यह अर्थ नहीं किया कि वह एक ऐसा 'सुख' है जिसे आदमी धम्मानुसार जीवन व्यतीत करने से, अपने ही प्रयत्न द्वारा यहीं इसी पृथ्वी पर प्राप्त कर सकता है |”

६ . उन परिव्राजकों ने जब भगवान बुद्ध से उनके द्वारा उपदिष्ट नया सद्धम्म सुना तो इसी प्रकार अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति की।

७. उन्हे लगा कि बुद्ध के रूप में उन्हें एक ऐसे जीवन-सुधारक मिल गये हैं, जिनका रोम-रोम धम्म की भावना से ओत-प्रोत है, और जो अपने युग के बौद्धिक ज्ञान से सुपरिचित हैं, जिन में ऐसी मौलिकता है और साहस है कि वे विरोधी विचारों की जानकारी रखने के बावजूद मुक्ति के एक ऐसे मार्ग का प्रतिपादन कर सके, जिस मुक्ति को यहीं, इसी जीवन में आत्म-साधना और आत्म-संयम द्वारा प्राप्त किया जा सकता है |

८. बुद्ध के लिये उनके मन में एसी असीम श्रद्धा उत्पन्न हुई कि उन्होंने उनके प्रति तुरन्त आत्म-समर्पण कर दिया और प्रार्थना की कि बुद्ध उन्हें अपना शिष्य बना लें |

९. बुद्ध ने उन्हे 'एहि भिक्खवे' (भिक्षुओ, आओ) कहकर भिक्षु संघ में दीक्षित कर लिया | वे पंचवर्गीय भिक्षु नाम से प्रसिद्ध हुए |

 मित्रों यही है भगवान बुद्ध द्वारा दिया गया पूर्ण प्रथम उपदेश जो सारनाथ में दिया गया था, जिसे धम्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। यहीं बौद्ध धर्म दोबारा पुनर्स्थापित हुआ और पुरे संसार में व्याप्त हुआ। 

आशा करता हूँ की अगर आपको मैं थोड़ा भी, इस धम्मोपदेश को सरल शब्दों में समझाने की सहायता में सफल हुआ हूँ, तो खुद को मैं धन्यभागी समझूंगा। 

और ऐसी मेरी मंगल कामना है की आपका जीवन मंगलमय हो, सुखमय हो, नमो बुद्धाय। 
भवतु सब्ब मंगलं। 
साधु। साधु। साधु।



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