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बौद्ध धर्म के सम्बन्ध मे मिथ्याओं और उनकी सत्यता की चर्चा - १ ।

मित्रों इस पोस्ट में मै बौद्ध धर्म की कुछ मिथ्याओं पर चर्चा में करूँगा, जो लोगों को बौद्ध धर्म के बारे में  गलत अफवाहों से आगाह कराती हैं और उनकी सच्चाई बताती हैं। ये पोस्ट थोड़ी लम्बी होगी इसलिए इसे भी भागों में  बाटा है मैंने। तो आइये पड़ते हैं इस पोस्ट का पहला भाग।  

                                                                                                                                                      












        आप विशाल बौद्ध वाङमय में से एक ऐसा चयन तैयार करना चाहें जिसमें जो कुछ भी हो यथासंभव बुद्धिगम्य हो, जिसमें 'भगवान बुद्ध और उनकी शिक्षाओं की एक पूरी रूप-रेखा आ जाय, जिसमें यथासंभव पुनरुक्ति भी कम से कम हो और जो न केवल बुद्धि-प्रधान मस्तिष्कों को बल्कि भावना-प्रधान प्रवृत्तियों को भी कल्याणमार्मी बना सकने में समर्थ हो सके--क्या यह कार्य सहज कार्य होगा ? और वह किस प्रकार का होगा ?                        

        आपके सम्मुख सारा त्रिपिटक है। त्रिपिटक का मतलब है सुत्त पिटक, विनय पिटक तथा अभिधम्म पिटक । सुत्त पिटक में पाँच निकाय हैं--(१) दोध निकाय, (२) मज्झिम निकाय, (३) संयुत्त निकाय, (४) अंगुत्तर निकाय तथा (५) खुद्दक निकाय । अकेले खुद्दक निकाय में ही धम्मपद, सुत्तनिपात जैसी पंद्रह पुस्तकें हैं। विनय पिटक में भी महावग्ग, चुल्लवग्ग आदि पाँच ग्रत्थों से कम नहीं हैं और अभिधम्म पिटक में तो पूरे सात ग्रन्थ हैं ।

         इन सभी ग्रन्थों पर पृथक पृथक अर्थकथाएं हैं जो अपने अपने मूलग्रन्थ से प्रायः कई गुनी हैं । त्रिपिटक-बाह्य किन्तु त्रिपिटक के ही समान आदृत मिलिन्द-प्रश्न तथा विसुद्धिमग्गो सदृश ग्रन्थ हैं । बुद्ध-चरित तथा दूसरा अवदान साहित्य है । अनेक समानतायें रहने पर भी, विषम प्रतीत होने वाले कथनों की भी कमी नहीं है ।

                                                                                                                                                       

          बौद्ध त्रिपिटक और उसकी अट्ठकथायें समुद्र की तरह विशाल हैं। उन्हें कंठस्थ कर सकना सचमुच एक बड़ी असाधारण बात थी । एक से अधिक बार ऐसा हुआ है कि भगवान बुद्ध ने जो कुछ कहा है, उसकी रिपोर्ट ठीक-ठीक नहीं हुई। भगवान बुद्ध के जीवन-काल में ही कई बार उनके वचनों की गलत रिपोर्ट उन तक पहुंची थीं| उदाहरण के तौर पर ऐसे पाँच अवसरों का उल्लेख किया जा सकता है।. . .

           शायद इस तरह के और भो अनेक अवसर आये हों जब तथागत के वचनों की ठीक रिपोर्ट न हुई हो। क्योंकि हम देखते हैं कि भिक्षु भी भगवान बुद्ध के पास गये हैं और प्रश्न किया है कि ऐसी परिस्थिति में उन्हें क्या करना चाहिये ?“कर्म”और 'पुनर्जन्म' (तक) के बारे में जब जब गलत रिपोर्ट  हुई हैं, उसके अनेक अवसर हैं । इसलिये त्रिपिटक में भी जो 'बुद्ध- वचन' करके माना गया है, उसे भी ‘बुद्ध वचन' स्वीकार करने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है।”

           परिस्थिति सचमुच विकट है। किन्तु सौभाग्य से, त्रिपिटक में ही एक कसौटी विधमान है जिससे किसी भी वचन के सम्बन्ध में यथार्थ निर्णय पर पहुंचने में सहायता ली जा सकती है। वह कसौटी है--

       “भगवान बुद्ध के बारे में एक बात बड़े ही विश्वास के साथ कही जा सकती है; वे कुछ नहीं थे, यदि उनका कथन बुद्धि-संगत, तर्क-संगत नहीं होता था । दूसरी बातों का यथायोग्य मूल्यांकन करते हुए यह बात कही जा सकती है कि जो बात बुद्धि-संगत है, जो बात तर्क-संगत है, वही बुद्ध-वचन है।”

         “दूसरी बात यह है कि भगवान बुद्ध ने कभी ऐसी बेकार की चर्चा में नहीं पड़ना चाहा जिसका आदमी के कल्याण से कोई सम्बन्ध न हो। इसलिये कोई भी ऐसी बात जिसका आदमी के कल्याण से कोई सम्बन्ध नहीं, यदि भगवान बुद्ध के सिर मड़ी जाती है, तो उसे 'बुद्धवचन' स्वीकार नहीं करना चाहिये ।” 

                                                                                                                                                       

         सिद्धार्थ कुमार प्रव्रजित हुए थे, यह सत्य है किन्तु प्रश्न है वह क्यों प्रव्रजित हुए थे ? परम्परागत मान्यता है कि एक बूढ़े, एक रोगी, एक मृत तथा एक साधु को देखकर। 

        यदि इन्हें संसार के दुःखमय जीवन का प्रतीक मानकर इस कथानक को एक अलंकारिक रूपक मात्र स्वीकार कर लिया जाय, तब तो बात दूसरी है किन्तु यदि २९ वर्ष की आयु होने तक भी सिद्धार्थ द्वारा एक बूढ़े, एक रोगी और एक मृत व्यक्ति को न देखे रहने की बात को 'ऐतिहासिक-सत्य' माना जाय तो यह 'ऐतिहासिक-सत्य' ऐसा ही सत्य होगा जिस पर हर विचारवान का प्रश्नचिह्न लगेगा और अवश्य लगेगा। आखिर इस ‘ऐतिहासिक सत्य' की प्राचीनतम साहित्यिक साक्षी क्या है ? 

       इसकी साहित्यिक साक्षी केवल वे अट्ठकथायें हैं जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचारयों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परंपरागत सिंहल अट्ठकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पालि भाषा में लिखा । क्‍या त्रिपिटक के अन्तर्गत गिने जाने वाले ग्रन्थों में से किसी भी ग्रन्थ में इस 'बूढ़े- रोगी- मृत- साधु' को देखकर अभिनिष्क्रमण किये जाने वाले कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है ? हमारी सीमित जानकारी में कहीं भी नहीं है। खुद्दक-निकाय के सुत्तनिपात के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त है। उसमें प्रव्रज्या का ठीक कारण व्यक्त हुआ प्रतीत होता है। उस सुत्त में है--

असदष्डा भयं जातं, जगं पस्सथ मेधकं ।

संबेगं कित्तयिस्सामि यथा संविजितं मया॥ १॥

कम्दमानं पखं दिस्वा मच्छे अप्पोरके यथा ।

अख्खमण्जेहि व्यादद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥। २॥।

समन्तसरो लोको, दिसा सब्या समेरिता ।

इच्छं भवनमसनो माहसासि अनोसितं ।

मोसामे त्थे व ब्याहड़े दिस्वा मे अरति अहु ॥ ३॥


(अर्थ--शस्त्र धारण भयावह लगा । 

(उससे) यह जनता कैसे झगड़ती है देखो । 

मुझमें संवेग (वैराग्य) कैसे उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। (२) 

अपर्याप्त पानी में जैसे मछलियां छटपटाती हैं वैसे एक-दूसरे से विरोध करके

छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे अन्त:करण में भय उत्पन्न हुआ | (३)

चारों ओर का जगत असार दिखाई देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं ऐसा लगा

और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक

सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया ।*)

                                                                                                                                                       

फिर सुत्तनिपात' के पब्बज्जा सुत्त के प्रारम्भ में ही निम्नलिखित गाथाएं हैं :-

पब्बज्जं कित्तयिस्सामि यथा पब्बजि चक्खुमा।

यथावीमंसमानो सो पब्बज्जं समरोचयि ॥१॥

संवाधोज्यं धरावासो रजस्सायतनं इति ॥

अब्भोकासो च पब्बज्ज: इति दिस्वान पब्बजि ॥२॥

(अर्थ-- चाक्षुष्मन्त ने प्रव्रज्या क्यों ली और उसे वह किस विचार से प्रिय लगी यह बतलाकर उसकी प्रव्रज्या का मैं वर्णन करता हूँ । (१) गृहस्थाश्रम तो अडचनों और कूड़े-कचरे की जगह है तथा प्रव्रज्या खुली हवा है यह जानकर वह परिव्राजक बन गया। (२) )   

         इन सब से हम इतना जरूर अनुभव करते हैं कि त्रिपिटक में उनके प्रव्रजित होने के कारणों की ओर जो भी छूट-पुट संकेत हैं वह 'बूढ़े- रोगी- मृत- साधु’ कथानक की अपेक्षा इस ‘एक दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर’ कथानक से मेल खाते हैं। इस प्रकार इसकी कम सम्भावना नहीं है कि सिद्धार्थ कुमार के अभिनिष्क्रमण के मूल में इस 'छटपटाने वाली प्रजा' के दुःख के मूल कारण को पता लगाने की आकांक्षा ही प्रधान रही हो। 

                                                                                                                                                       

       क्या इसमें कुछ भी आश्चर्य हो सकता है कि लोग उसे यह कहकर याद करते रहे हों कि “यह उच्च कुलोत्पन्न था, श्रेष्ठ माता-पिता की संतान था, सम्पन्न था, तारुण्य के मध्य में था, सुन्दर शरीर और बुद्धि से युक्त था, सुख-भोग में पला था और वही अपने संबंधियों से इसलिये लड़ा कि पृथ्वी पर शान्ति बनी रहे और जनता का कल्याण हो ।” लोगों का कहना था कि यह “इसका स्वेच्छा से किया हुआ महान त्याग है। यह बड़ी ही वीरता ओर साहस का कार्य है। संसार के इतिहास में इसकी उपमा नहीं। यह शाक्य-मुनि अथवा शाक्य- सिंह कहलाने का अधिकारी है ।”

        जिस प्रकार जंजीर की एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुड़ी रहती है उसी प्रकार भगवान बुद्ध के इस गृह-त्याग के उद्देश्य और उसक़ी पूर्ति की पुण्य- गाथा का ही नाम ‘भगवान बुद्ध का धर्म' होना ही चाहिए। यह मान्य ही है कि भगवान बुद्ध ने जनता के दुःख के कारणों की गहराई में जाकर उन कारणों को नष्ट करने का उपाय जान कर, जनता को उसकी जानकारी करा कर दु:ख का मूलोच्छेद करने के उद्देश्य से ही गृह त्याग किया । 

                                                                                                                                                       

         अब यह दुःख दो तरह का हो सकता है--(१) सम्परायिक दुःख; (२) सांदिट्ठीक दुःख।    

(१) पहला वह दुःख जो किसी को नरक या अपाप में जन्म ग्रहण करने पर भोगना पड़ता है तथा वह दुःख जो किसी को बार बार जन्म ग्रहण करने से भोगना पड़ता है तथा वह दुःख भी जो जन्म लेने मात्र का ही अवश्यम्भावी परिणाम है अर्थात जो दु:ख जन्म ग्रहण करने का ही दूसरा पर्याय है।  

(२) दूसरा वह दुःख जो राग, द्वेष तथा मोह के कारण उत्पन्न होता है और राग, द्वेष तथा मोह का क्षय कर देने से यहीं इसी छ: फुट के शरीर में ही जिसका अंत किया जा सकता है।

      बौद्ध वाङमय में दोनों प्रकार के दुःखों की चर्चा है। मान लेने की बात दूसरी है, किन्तु सम्परायिक दुःखों की उलझन में उलझने के बाद आदमी को नरक के अस्तित्व का--भले ही वह सिद्ध हो चाहे असिद्ध हो--स्वीकार करना ही पड़ता है; मरणान्तर जन्म ग्रहण को--भले ही वह भी सिद्ध हो चाहे असिद्ध हो--स्वीकार करना ही पड़ता है तथा जीवन को ही स्वभाव से दु:ख रूप मान लेना होता है। 

 

(शेष अगले भाग में...............) 

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