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बौद्ध धर्म के सम्बन्ध मे मिथ्याओं और उनकी सत्यता की चर्चा - २।

 मित्रों इस पोस्ट में मै बौद्ध धर्म की कुछ मिथ्याओं पर चर्चा में करूँगा, जो लोगों को बौद्ध धर्म के बारे में  गलत अफवाहों से आगाह कराती हैं और उनकी सच्चाई बताती हैं। ये पोस्ट थोड़ी लम्बी होगी इसलिए इसे भी भागों में  बाटा है मैंने। तो आइये पड़ते हैं इस पोस्ट का दूसरा और अंतिम  भाग। (अब आगे.... ) 

                                                                                                                                               












यह सभी मान्यतायें किसी के गले उतर सकती हैं और किसी के गले नहीं भी उतर सकती हैं। किन्तु सांदिट्ठीक दुःख का जो रूप है, उसकी जो अनुभूति है और उसके क्षय की भी जो पूरी सम्भावना है उसके लिए उक्त किन्हीं भी मान्यताओं का आश्रय लेने की अपेक्षा नहीं। भगवान बुद्ध ने अपने धर्म को “सांदृष्टिक धर्म” ही कहा है। हमारा नित्य प्रति का धर्मानुस्मरण इसी प्रकार का है:-

“स्वाक्खातो भगवता धम्मो सन्दिट्ठीको ,अकालिको, एहि पस्सिको, ओपनयिको,पच्चत्तं वेदितब्बो विज्जूहिति”

( भिक्षुओं! यह धरम अच्छी तरह समझा कर कहा गया है, यह सांदृष्टिक है, यह अकालिक है, इसके बारे में कहा जा सकता है कि आओ और स्वयं देख लो, यह ऊपर उठाने वाला है और हर विज्ञ (पुरुष) इसका स्वयं साक्षातकर सकता है। )

                                                                                                                                                       

   प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय की साम्प्रदायिक शिक्षाओं की यही विशेषता है कि यदि कोई उन्हें सिद्ध नहीं कर सकता तो उन्हें कोई असिद्ध भी नहीं कर सकता पक्षपाती एक तरह के तर्क देते रहते हैं, विरोधी दूसरी तरह के । न उनके तर्कों से कुछ सिद्ध होता है और न इनके तरकों से कुछ खंडित | लाभ इतना ही है कि जबान की लपालपी अथवा शास्त्र-चर्चा युग-युगान्त तक बनी रहती है।

    हमें किसी की साम्प्रदायिक मान्यताओं का खण्डन करते फिरने की आवश्यकता नहीं, किन्तु यदि वे हमारे सांदृष्टिक धर्म-पालन के मार्ग में बाधा बन कर खड़ी होती हैं तो उन्हें भी कदाचित आड़े हाथों लेना ही पड़ सकता है।

                                                                                                                                                       

       जिन्हें भारतीय विचार-धारा और यहां की साम्प्रदायिक मान्यताओं का उतना परिचय नहीं वे जहाँ भी पुनर्जन्म, कर्म, मोक्ष आदि भारतीय संस्कृति के सुपरिचित शब्दों को देखते हैं वहाँ उनके मनमाने अर्थ करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि सभी धार्मिक परम्पराओं में इन शब्दों का अपना अपना अर्थ-वैशेष्य सुरक्षित रहते हुए भी शब्द साम्य ही वह रज्जु है जो उन्हें एक- रूपता के सूत्र में बांधे हुए है। पुनर्जन्म, कर्म, मोक्ष आदि सर्वजन परिचित शब्दों के बौद्ध अर्थों की विशेषता को प्रकट करना कोई साधारण कार्य नहीं है।

       इतना तो हम भी कहना ही चाहेंगे कि यदि बौद्ध पुनर्जन्म तथा अबौद्ध पुरर्जन्म में कोई अन्तर नहीं, यदि बौद्ध कर्म तथा अबौद्ध कर्म में कोई अन्तर नहीं और यदि बौद्ध मोक्ष या निर्वाण तथा अबौद्ध मोक्ष में कोई अन्तर नहीं तो फिर बौद्ध-धर्म की अपनी कुछ भी विशेषता है ही नहीं। इन विषयों में शब्द-साम्य भले ही कितना ही हो, अर्थ साम्य हो ही नहीं सकता। बौद्ध परम्परा सम्पूर्णतया अनात्मवादी है और अबौद्ध ‘समय' प्रायः सभी आत्मवादी।

   अनीश्वरवाद तथा अनात्मवाद बौद्ध-धम्म के दो ऐसे कुल्हाड़े हैं कि बिना उनकी सहायता के अबौद्ध मान्यताओं के झाड़-झंखाड़ को साफ किये, बौद्ध धर्म के भवन की आधार-शिला रखी ही नहीं जा सकती। यूं हम सभी मानते हैं कि आदमी सामाजिक प्राणी है और यह भी मानते हैं कि मनुष्येत्तर प्राणियों के भी अपने अपने समाज हैं, किन्तु पता नहीं जब हम किसी आदमी का उसके धार्मिक रूप में अध्ययन करना चाहते हैं तो उसे क्यों इतना एकाकी मान बैठते हैं ? हर आदमी में एक “आत्मा” मान ली जाती है और सब आदमियों के ऊपर एक           

       'परमात्मा' मान लिया जाता है उस आत्मा”का उस 'परमात्मा' में लीन कर सकना जीवन का परम उद्देश्य' घोषित कर दिया जाता है। आदमी जितना ही 'परमात्मा' के समीप सरकता जाता है उतना ही अपने निकट सम्बन्धियों तक से दूर होता चला जाता है। ऐसा क्‍यों न हो, जब गुढ़ती के साथ ही यह शिक्षा दी जाती है--

जाके हृदय न रास-वैदेही

तजो ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि पर सनेही

तज्यो पिता प्रद्भधाद, विभोषण बन्धु, भरत महतारी. . .

                                                                                                                                                       

       किन्तु भगवान बुद्ध के धर्मं की आधार-शिला आदमी-आदमी का परस्पर का योग्य सम्बन्ध ही है। यह सचमुच खेद की बात है कि इस विषय में बौद्ध धर्म तक के बारे में लोगों के मन में सर्वथा गलत धारणायें घर किये हुए हैं। पहले तो केवल इसलिये कि बुद्ध ने जो कहा वह प्राय: 'भिक्षुओं' को ही सम्बोधित करके कहा, दूसरे शायद इसलिये भी कि संगीतिकारक भिक्षु ही थे और उन्होंने स्वभावत: उन्हीं बातों को अधिक महत्व दिया होगा जो उनसे संबंधित थीं, लोगों ने बुद्ध-धर्मं को भिक्षुओं का ही धर्म समझ लिया ।

      भिक्षुओं की संख्या कितनी भी अधिक रही हो। भगवान बुद्ध के गृहस्थ उपासकों की संख्या उनसे अधिक ही रही होगी। इसलिये बौद्ध-धर्मं जितना भिक्षुओं का धर्म था, उतना हो मृहस्थों का धर्म। फिर उन भिक्षुओं को चीवर, पिंडपात्र,शयनासन तथा रोगी होने पर दवाई आदि देने वाले गृहस्थ लोग ही थे। यह ठीक है कि भिक्षु गृहस्थों को शिक्षा देते थे, किन्तु भिक्षुओं को भिक्षा देने वाले तो गृहस्थ ही रहे होंगे। इसलिये बुद्ध- शासन जितनी मात्रा में भिक्षुओं पर निर्भर करता था उससे कम मात्रा में गृहस्थों पर नहीं ।

                                                                                                                                                       

       डा. आम्बेडकर का यह कथन कि बौद्धधों का एक पृथक समाज न होना बौद्ध धर्म के भारत से लुप्त होने के कारणों में से एक कारण है, किसी हृद तक सचमुच विचारणीय है; किन्तु यह वर्तमान युग को ऐसी अवश्यकता नहीं दी है कि देश में जितने धर्मं हों उतने ही पृथक पृथक समाज हों। प्राचीन काल से बौद्ध-समाज की ये कुछ विशेषतायें रही हैं-

(१) बौद्ध समाज के सभी सदस्य परस्पर एक दूसरे को समान मानते रहे हैं।

(२) बोद्ध समाज के सभी सदस्यों को शिक्षा प्राप्त करने की समान स्वतंत्रता रही है।

(३) बौद्ध समाज के सभी सदस्यों को कोई भी पेशा कर सकने की स्वतन्त्रता रही है।

(४) बौद्ध समाज की स्त्रियों को पुरुषों के समान ही अधिकार रहे हैं।

संक्षेप में कहना हो तो यही सकते हैं कि बौद्ध समाज वर्णाश्रम धर्मरूपी बेड़ियों से सर्वता स्वतन्त्र रहा है।

                                                                                                                                                       

    प्रश्न है और मत्वपूर्ण प्रश्न है कि एक भिक्षु का जीवन-कार्य क्‍या है ? क्‍या भिक्षु जीवन व्यक्तिगत साधना के लिये ही है अथवा उसे लोगों कि सेवा तथा उनका मार्म दर्शन भी करना ही है ? उत्तर है-“ये दोनों ही उसके जीवन-कार्य हैं। बिना व्यक्तिमत साधना के वह नेतृत्व कर नहीं सकता। इसलिये उसे अपने में एक सम्पूर्ण सर्वश्रेष्ठ, धार्मिक और ज्ञान-सम्पन्न व्यक्ति बनना ही होगा। इसके लिये उसे व्यक्तिगत साधना करनो ही होगी। 

       “एक भिक्षु गृहत्याग करता है। वह संसार त्याग नहीं करता। वह अपने घर को इसलिये छोड़ता है ताकि उसे उन लोगों की सेवा करने का अवसर मिल सके जो अपने अपने घर में बुरी तरह आसक्त हैं और जो दु:ख में पड़े हैं, जो चिन्ता में पड़े हैं, जिन्हें चैन नहीं है और जिन्हें सहायता की अपेक्षा है।” 

         यदि भिक्षुसंघ में ऐसे ही बहुसंख्यक भिक्षु नहीं होंगे तो यह कह सकना कठिन है कि तब भिक्षु-संघ की क्या सामाजिक उपयोगिता बनी रहेगी ? और यदि सामाजिक उपयोगिता बनी नही रहेगी तो यह भी कह सकना कठिन है कि स्वयं भी बना ही रहेगा व नहीं ?

                                                                                                                                                       

आलोचना होना स्वाभाविक बात और बौद्ध धर्म के सम्बन्ध में गलत फहमियां पैदा करना बहुत आसान है क्यों क्योंकि यह लोगों को नियंत्रण करने का काम नहीं करता है, पर इतना सत्य है की यह आपका मंगल करता है । ये स्वाभाविक धर्म है और अपनी निजता की स्वतंत्रता से धारण होता है, इसलिए संदृष्टिक धर्म कहा गया है अर्थात ये न तो कोई प्रलोभन देता और ना ही भय के कारण धारण होता है।  ये तो बुद्धि का मार्ग है, यदि समझ आ जाये कल्याण ही कल्याण है।

    इसी सम्बन्ध में न्यूटन के बारे में सुनी या पढ़ी एक घटना याद आ गई। बड़े परिश्रम से उसने गणित का एक प्रश्न हल करके रखा था। पास बंठे पिल्‍ले ने स्याही की दवात लुढ़का दी। न्यूटन नें इतना ही कहा--तू क्‍या जाने तूने कितनी बड़ी हानि की है! ”

                                                                                                                                                       

अंत मे सिर्फ इतना ही इस छोटे से प्रयास से अगर अपने मस्तिष्क से थोड़ी भी बौद्ध धर्म के बारे में आपकी गलत-फहमी दूर हुई हो, तो में खुद को धन्यभागी समझूंगा। आपका जीवन मंगलमय हो ऐसी मेरी कामना है; नमो बुद्धाय।

भवतु सब्ब मंगलं। 
साधु। साधु। साधु।    

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