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राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म ।







१. सिद्धार्थ गौतम ने शुद्धोदन के घर में जन्म ग्रहण किया था | उनके जन्म की कथा इस प्रकार है |

२. शाक्य-राज्य के लोग आषाढ़ के महिने में एक महोत्सव मनाया करते थे | इस उत्सव में क्या राजा, क्या प्रजा सभी सम्मिलित होते थे |

३. सामान्यरूप से यह महोत्सव सात दिन तक मनाया जाता था |

४. एक बार महामाया ने इस उत्सव को बड़े ही आमोद- प्रमोद के साथ, बडी ही शान-शौकत के साथ, फूलों के साथ और सुगन्धियों के साथ मनाने का निश्चय किया। हाँ उसमें सुरामेरय आदि नशीली वस्तुओ का सर्वथा परित्याग था |

५. सातवें दिन वह प्रात: काल उठी। सुगन्धित जल से स्नान किया | चार लाख कार्षापणों का दान दिया | अच्छे से अच्छे गहने- कपडे पहने | अच्छे से अच्छे खाने खाये | व्रत रखे | तदनंतर वह खूब सजे-सजाये शयनानगर में सोने के लिये चली गई|

६. उस रात शुद्धोदन और महामाया निकट हुए और महामाया ने गर्भ धारण किया | राजकीय शय्या पर पड़े पड़े उसे नींद आ गई| निद्रा- ग्रस्त महामाया ने एक स्वप्न देखा |

७. उसे दिखाई दिया कि चतुर्दिक महाराजिक देवता उसकी थय्या को उठा ले गये हैं और उन्होने उसे हिमवन्त प्रदेश में एक शाल-वृक्ष के नीचे रख दिया है | वे देवता पास खड़े हैं |

८. तब चतुर्दिक महाराजिक देवताओं की देवियाँ वहा आयीं और उसे उठाकर मानसरोवर ले गयीं|

९. उन्होने उसे स्नान कराया, स्वच्छ वस्त्र पहनाये, सुगन्धियों का लेप किया और फूलो से ऐसा और इतना सजाया कि वह किसी दिव्यात्मा का स्वागत कर सके |

१०. तब सुमेध नाम का एक बोधिसत्व उसके पास आया और उसने प्रश्न किया, “मैने अपना अन्तिम जन्म पृथ्वी पर धारण करने का निश्चय किया है, क्या तुम मेरी माता बनना स्वीकार करोगी?” उसका उत्तर था -- “बड़ी प्रसन्‍नता से ।”उसी समय महामाया देवी की आँख खुल गई ।

११. दूसरे दिन महामाया ने शुद्धोदन से अपने स्वप्न की चर्चा की | इस स्वप्न की व्याख्या करने में असमर्थ राजा ने स्वप्न-विद्या में प्रसिद्ध आठ ब्राह्मणों को बुला भेजा |

१२. उनके नाम थे राम, ध्वज, लक्ष्मण, मन्त्री, यण्ण, भोज, सुयाम और सुदत्त | राजा ने उनके योग्य स्वागत की तैयारी की |

१३. उसने जमीन पर पुष्पवर्षा कराई और उनके लिये सम्मानित आसन बिछवाये |

१४. उसने ब्राह्मणों के पात्र चांदी-सोने से भर दिये और उन्हें घी, मधु, शक्कर, बढ़िया चावल तथा दूध से पके पकवानों से संतर्पित किया |

१५. जब ब्राह्मण खा-पीकर प्रसन्न हो गये, शुद्धोदन ने उन्हें महामाया का स्वप्न कह सुनाया और पूछा --“मुझे इसका अर्थ बताओ|”

१६. ब्राह्मणों का उत्तर था, “महाराज! निश्चित रहें। आपके यहाँ एक पुत्र होगा। यदि वह घर में रहेगा तो वह चक्रवर्ती राजा होगा; यदि गृहत्याग कर संन्यासी होगा तो वह बुद्ध बनेगा - संसार के अन्धकार का नाश करने वाला |”

१७. पात्र में तेल धारण किये रहने की तरह महामाया बोधिसत्व को दस महीने तक अपने गर्भ में धारण किये रही | समय समीप आया जान उसने अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की | अपने पति को सम्बोधित करके उसने कहा-- “मै अपने मायके देवदह जाना चाहती हूँ।”

१८. शुद्धोदन का उत्तर था-- “तुम जानती हो कि तुम्हारी इच्छा की पूर्ति होगी ।”कहारों के कन्धों पर ढोई जाने वाली सुनहरी पालकी में बिठवा कर अनेक सेवक-सेविकाओं के साथ थुद्धोदन ने महामाया को उसके मायके भिजवा दिया |

१९. देवदह के मार्ग में महामाया को शाल-वृक्षों के एक उद्यान-वन में से गुजरना था, जिसके कुछ वृक्ष पुष्पित थे कुछ अपुष्पित |यह लुम्बिनी-वन कहलाता था |

२०. जिस समय पालकी लुम्बिनी-वन में से गुजर रही थे, सारा लुम्बिनी वन दिव्य चित्र लता की तरह अथवा किसी प्रतापी राजा के सुसज्जित बाजार जैसा प्रतीत होता था |

२१. जड से वृक्षों की शाखाओं के छोर तक पेड फलों और फूलों से लदे थे | नाना रंग के भ्रमर-गण गुन्जार कर रहे थे | पक्षीचहचहा रहे थे |

२२. यह मनोरम दृश्य देखकर महामाया के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि वह कुछ समय वहाँ रहे और क्रीडा करे | उसने पालकी ढोने वालों को आज्ञा दी कि वह उसकी पालकी को शाल- उद्यान में ले चले और वहाँ प्रतीक्षा करें |

२३. महामाया पालकी से उतरी और एक सुन्दर शाल-वृक्ष की ओर बढ़ी | मंद पवन बह रहा था, जिससे वृक्ष की शाखायें ऊपर-नीचे हिल डोल रही थी | महामाया ने उनमें से एक को पकड़ना चाहा |

२४. भाग्यवश एक शाखा काफी नीचे झुक गई । महामाया ने पंजों के बल खड़ी होकर उसे पकड लिया । तुरन्त शाखा ऊपर की ओर उठी और उसका हलका सा झटका लगने से महामाया को प्रसव-वेदना आरम्भ हुई | उस शाल- वृक्ष की शाखा पकडे, खडे ही खडे महामाया ने एक पुत्र को जन्म ढिया |

२५. ५६३ ई. पू. में वैशाख पुर्णिमा के दिन बालक ने जन्म ग्रहण किया |

२६. शुद्धोदन और महामाया का विवाह हुए बहुत समय बीत गया था | लेकिन उन्हें कोई सन्तान न हुई थी | आखिर जब पुत्र-लाभ हुआ तो केवल शुद्धोदन और उसके परिवार द्वारा ही नहीं, बल्कि सभी शाक्यों द्वारा पुत्र जन्मोत्सव बड़ी ही शान-बान और बड़े ही ठाट-बाट के साथ अत्यन्त प्रसन्‍नतापूर्वक मनाया गया |

२७. बालक के जन्म के समय अपनी बारी से, शुद्धोदन पर कपिलवस्तु का शासन करने की जिम्मेदारी थी | वह 'राजा' कहलाया, और इसीलीये स्वाभाविक तौर पर बालक भी राजकुमार |


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