१. जिस समय बालक का जन्म हुआ, उस समय हिमालय में असित नाम के एक बड़े ऋषि रहते थे |
२. असित ने सुना कि आकाश-स्थित देवता “बुद्ध”शब्द की घोषणा कर रहे है | उसने देखा कि वह अपने वस्त्रों को ऊपर उछाल-उछाल प्रसन्नता के मारे इधर-उधर घूम रहे है | वह सोचने लगा कि मैं वहाँ क्यों न जाऊँ, जहाँ 'बुद्ध' ने जन्म ग्रहण किया है|
३. जब असित ऋषि ने समस्त जम्बूद्वीप पर अपनी दिव्यदृष्टि डाली, तो देखा कि शुद्धोदन के घर में एक दिव्य बालक ने जन्म ग्रहण किया है और देवताओं की भी इतनी अधिक प्रसन्नता का यही कारण है |
४. इसलिये वह महान ऋषि असित अपने भानजे नरदत्त के साथ राजा शुद्धोदन के घर आये और उसके महल के द्वार पर खड़े हुए|
५. अब असित ऋषि ने देखा कि शुद्धोदन के द्वार पर लाखों आदमियों की भीड एकत्रित है। वह द्वारपाल के पास गये और कहा --“अरे ! जाकर राजा से कहो की दरवाजे पर एक ऋषि खड़े हुए हैं ।”
६. द्वारपाल राजा के पास गया और हाथ जोड़कर विनती की -- “राजन ! द्वार पर एक वृद्ध ऋषि पधारे है और आप से भेंट करना चाहते हैं |”
७. राजा ने असित ऋषि के बैठने के लिये आसन की व्यवस्था की और द्वारपाल को कहा --ऋषि को आने दो |” महल के बाहर आकर द्वारपाल ने असित से कहा -- “कृपया भीतर पधारें।”
८. असित ऋषि राजा के सामने उपस्थित हुए और उसे खड़े-खड़े आशीर्वाद दिया -- “राजन ! आपकी जय हो | राजन! आपकी जय हो | आप चिरकाल तक जियें और अपने राज्य पर धर्मानुसार शासन करें |”
९. तब शुद्धोदन ने असित ऋषि को साष्टांग दंडवत किया और उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। जब उसने देखा कि असित ऋषि सुखपूर्वक आसीन है तो शुद्धोदन ने कहा -- “ऋषिवर ! मुझे स्मरण नहीं है कि इसके पूर्व आपके दर्शन हुए हों | आपके यहाँ आगमन का क्या उद्देश्य है? आपके यहाँ पधारने का क्या कारण है?”
१०. तब असित ऋषि ने राजा शुद्धोदन से कहा, “राजन ! तुम्हें पुत्र- लाभ हुआ है। मैं उसे देखने के लिये आया हूँ ।”
११. शुद्धोदन बोला, “ऋषिवर! बालक सोया है | क्या आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करने की कृपा करेंगे?” ऋषि का उत्तर था, “राजन! इस तरह के दिव्य विभूतियाँ देर तक सोती नहीं रहतीं | वे स्वभाव से ही जागरूक होती है |”
१२. तब बालक ने ऋषि पर अनुकम्पा करके अपने जागते रहने का संकेत किया |
१३. यह देख कि बालक जाग उठा है, थुद्धोदन ने उसे दृढ़तापूर्वक दोनो हाथो में लिया और असित ऋषि के सामने ले आया |
१४. असित ने देखा कि बालक बत्तीस महापुरुष-लक्षणों तथा अस्सी अनुव्यज्जनों से युक्त है | उसने देखा कि उसका शरीर शुक्र और ब्रह्मा के शरीर से भी अधिक दीप्त है और उसका तेजोमण्डल उनके तेजोमण्डल से लाख गुणा अधिक प्रदीप्त है | उसके मुँह से तुरन्त यह वाक्य निकला -- “निस्सन्देह यह अद्भुत पुरुष है ।”वे अपने आसन से उठे, दोनों हाथ जोडे और उसके पैरों पर गिर पड़े | उन्होने बालक की परिक्रमा की और उसे अपने हाथों में लेकर विचार-मग्र हो गये |
१५. असित ऋषि पुरानी भविष्यवाणी से परिचित थे कि जिसके शरीर में गौतम की ही तरह के बत्तीस महापुरुष-लक्षण होंगे, वह इन दो गतियों में से एक को निश्चित रूप से प्राप्त होगा, तीसरी को नहीं | “यदि वह गृहस्थ रहेगा, तो वह चक्रवर्ती नरेश होगा |, लेकिन यदि वह गृहत्याग कर प्रव्रजित हो जायेगा तो वह सम्यक सम्बुद्ध होगा |”
१६. असित ऋषि को निश्चय था कि यह बालक गृहस्थ नहीं बनेगा |
१७. बालक की ओर देखकर, वह सिसकियाँ भर- भर कर रोने लगा |
१८. शुद्धोदन ने देखा कि असित ऋषि सिसकियाँ भर- भर कर रो रहा है |
१९. उसे इस प्रकार रोता देखकर, शुद्धोदन के रोंगटे खडे हो गये | उसने असित ऋषि से निवेदन किया -- “ऋषिवर ! आप इस प्रकार रो क्यों रहे हैं? आंसू क्यों बहा रहे हैं? ठंडी साँस क्यों ले रहे हैं? मैं समझता हूँ कि बालक का भविष्य तो निर्विघ्न ही है ?”
२०. असित ऋषि ने राजा को उत्तर दिया - “राजन ! मैं बच्चे के लिये नहीं रो रहा हूँ | इसका तो भविष्य निर्विघ्न है | मैं अपने लिये रो रहा हूँ ।”
२१. 'ऐसा क्यों?” शुद्धोदन ने पूछा | असित ऋषि का उत्तर था, “मै जराजीर्ण हूँ, वय: प्राप्त हूँ और यह बालक निश्चयात्मक रूप से“बोधि' लाभ करेगा, सम्यकसंबुद्ध होगा | तदनन्तर वह लोक-कल्याण के लिये अपना धम्म- चक्र प्रवर्तित करेगा, जो इससे पहले इस संसार में कभी प्रवर्तित नहीं हुआ है |”
२२. “जिस श्रेष्ठ जीवन की, जिस सद्धर्म की वह घोषणा करेगा वह आदि में कल्याणकारक होगा, मध्य में कल्याणकारक होगा और अन्त में कल्याणकाकरक होगा | वह अर्थ तथा व्यंजन की दृष्टि से निर्दोष होगा | वह परिशुद्ध होगा | वह परिपूर्ण होगा |
२३. “जिस प्रकार राजन! कभी कहीं इस संसार में उदुम्बर (गूलर)पुष्पित होता है, उसी प्रकार अनंत युगों के अनन्तर इस संसार में कहीं बुद्धोत्पाद होता है | राजन! इसी प्रकार निश्चय से यह बालक “बोधि' लाभ करेगा, सम्यक सम्बुद्ध होगा और तदनन्तर अनन्त प्राणियों को इस दुःखमय सागर के पार ले जाकर सुखी करेगा |
२४. “लेकिन राजन! मै उस बुद्ध को नहीं देख सकूंगा! इसलिये राजन! मैं इस दुःख से दुखी हूं और रो रहा हूँ | मेरे भाग्य में उस बुद्ध की पूजा करना नहीं बदा है ।”
२५. तब राजा ने असित ऋषि और उसके भानजे नाहक (नरदत्त) को श्रेष्ठ भोजन से संतर्पित किया और वस्त्र दान दे उनकी परिक्रमा कर वन्दना की |
२६. तब असित ने अपने भानजे नालक को कहा, “नरदत्त! जब कभी तुम्हें यह सुनने को मिले कि यह बालक 'बुद्ध' हो गया है तो जाकर शरण ग्रहण करना । यह तेरे सुख, कल्याण और प्रसन्नता के लिये होगा ।”इतना कहकर असित ने राजा से बिदा ली और अपने आश्रम चला गया |




No comments:
Post a Comment