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महामाया माता का महारिनिर्वाण।


















१. पांचवें दिन नामकरण संस्कार किया गया | बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया | उसका गोत्र गौतम था, क्योंकि उसका पालन-पोषण महाप्रजापति गौतमी ने किया था  | इसीलीये जनसाधारण में वह सिद्धार्थ गौतम से प्रसिद्ध हुआ|

२. बालक के जन्म की खुशियाँ और उसके नामकरण की विधियाँ अभी समाप्त नहीं हुई थीं कि महामाया अचानक बीमार पड़ीं और उनके रोग ने गम्भीर रूप धारण कर लिया |

३. अपना अन्त समय निकट आया जान उसने शुद्धोदन और प्रजापति को अपनी शय्या  के समीप बुलाया और कहा -- “मुझे विश्वास है कि असित ने मेरे बच्चे के बारे में जो भविष्यवाणी की है, वह सच्ची निकलेगी | मुझे यही अफसोस है कि मैं इस वाणी को पूरा हुआ न देख सकूंगी|”

४. “प्रजापति! मैं अपना बच्चा तुम्हे सौंप जाती हूँ। मुझे विश्वास है कि उसके लिये तुम उसकी माँ से भी बढ़कर  होगी|”

५. “मेरा बालक शीघ्र ही मातृ-हीन बालक हो जायेगा | लेकिन मुझे इसकी तनिक चिन्ता नहीं है कि मेरे बाद यथायोग्य विधि से उसका लालन-पालन नही होगा |”

६. “अब दुखी न हों । मुझे मरने दें | मेरा अन्त समय आ पहुँचा है | यमदूत मेरी प्रतीक्षा कर रहे है ।”इतना कहते-कहते महामाया ने अन्तिम सांस ले ली | शुद्धोदन और प्रजापति दोनों को ही बड़ा दु:ख हुआ । दोनों फूटफूटकर रोने लगे |

७. जब सिद्धार्थ की माता का देहान्त हुआ तो उसकी आयु केवल सात दिन की थी |”

८. सिद्धार्थ का एक छोटा भाई भी था | उसका नाम था नन्द | वह शुद्धोदन का महाप्रजापति से उत्पन्न पुत्र था |

९. उसके ताया- चाचा की भी कई सन्तानें थीं | महानाम और अनुरुद्ध शुक्लोदन के पुत्र थे तथा आनन्द अमितोदन के | देवदत्त उसकी बुआ अमिता का पुत्र था | महानाम सिद्धार्थ की अपेक्षा बड़ा था और आनन्द छोटा |

१०. सिद्धार्थ उनके साथ खेलता-खाता बड़ा हुआ |

 

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